Thursday, 21 April 2011

सदाकत

हते  है सदाकत को अल्फाज़ दरकार नही होते और झूठ अल्फाजो की पुश्त-पनाही  लेकर भी हरगिज -हरगिज मुकम्मल नही होता ,आज क्यूकर मै अपनी अम्मी से झूठ बोला और बोला भी क्या के एक झूठ की परदापोशी के वास्ते मुझे सो झूठ का इंतजाम करना पड़ा .मुझे काफी सदमा हुआ लेकिन लाजिम था के कुछ एस कदर करा जाए  .
दरअसल ,बात यह थी की मुझे एक दोस्त के तबस्सुम से एक निजी शोबे में कुछ काम-झाम मिलने वाला था ,अम्मी से मैंने चंद रोज़ पहले ज़िक्र किया था लेकिन कुछ वजूहात ऐसी हुई के जो होना था वो हो ना सका .गुज़रे तीन रोज़ से वो मुझसे जवाब -तलब थी के किया हुआ .आखिर आज सुब्ह मैंने झूठ  बोला क़ि वे लोग एक बड़ी रुकुम का एहतमाम मागते है .बतोर जमानत .मुझे उमीद थी के  अम्मी को मालूम है के हम गुरबत के मारे इतना बड़ा एहतमाम नही कर सकते  ,लेकिन यहाँ   मंजर अजीब था ,वो बोली कही से किसी सुरत इंतजाम हो जाए तो ,मै भवर में फस गया के अब किया किया जाए .मै फिर से झूठ के खेमे में था .मैंने कहा ,वे लोग तीन माह तलक अदनी सी तनख्वाह देगे ,तब जाकर अम्मी कही चुप हुई ,लेकिन मेरे अंदर जो तूफां  उठा वो अभी भी आराम फरमा नही हुआ .इससे यह तासुर भी पैदा नही होता के अम्मी दरहकीकत से बेखबर  है ,नही वो भी बा-खबर होगी लेकिन मुदे को कही ना कही दफन करना उसकी भी  मजबूरी थी 
  बात यह है के सदाकत का दामन छोड़ देने से गहरे समन्दर में तो क्या किनारे पर भी डूब जाते हैं    

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