Saturday, 31 December 2011

उनके हजारों हकदार

इन आँखों की महफ़िल से जो सपने हजार निकले
मगर जितने भी निकले ,बेज़ारो -बेकार निकले
सारा शहर जो सोगवार देखा अपनी ही मौत पर
मगर वो दावते हुस्न घर से होकर तैयार निकले
खैरात मांगी ताउम्र हमने जो उनसे जिंदगी की
लम्हा -लम्हा मगर वो मौत के तलबगार निकले
सोचा था हमारे ही होंगें वो मेहरबाँ जमाने से
बात निकली तो उनके हजारों हकदार निकले
कहते थे मजबूर हैं हम अहले वफा निभाने में
मगर बेवफाई में वो ही आला फनकार निकले
लिबासे यारां हमकलाम होते रहे जो हमसे खुदाया
बर्बाद करने वाले वो ही "मस्ताने -यार " निकले

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